सोमवार, 27 जून 2016

भारत राष्ट्र के प्रमुख धर्म "हिंदु" में व्यापत "जातिवाद" पर प्रहार करती मेरी एक रचना।

प्राण प्रतिष्ठा

आज हरखू मिस्त्री सुबह-सवेरे चार बजे ही जाग नहा-धोकर, बेटे के ब्याह में समधियाने से भेंट में मिला सफेद लट्ठे का कुरता, पायजामा पहिन, सिर में ढेर सारा सरसों का तेल लगा तथा हथेलियों पर बचा तेल हाथ-पांव पर मल तैयार बैठा था। उंकडू बैठ छोटे से आईने में झांक कर कैंची से मूँछे काटता तथा जोर-जोर से कबीर के पद गाता हरकू सच-मुच बंदर सा लग रहा था। आज उसका मन बहुत खुश था। आज गांव के नये मंदिर में श्री राम भगवान की मूर्ती की प्राण-प्रतिष्ठा जो होनी है। गांव के मंदिर के निर्माण कार्य में मुख्य मिस्त्री की भूमिका हरखू मिस्त्री ने ही निभायी है। मंदिर की एक-एक ईंट हरखू के हाथ की ही लगी हुई है, चबूतरे से लेकर कंगूरे तक। मई-जून की भयानक तपती दोपहर की धूंप में कबीर के पद गाता हुआ हरखू जब मंदिर के कंगूरे पर चढ कर काम करता तो, उसे लगता कि वह भगवान राम की सेना का कोई सैनिक है, तथा रावण की लँका धवस्त करने हेतु सेतु निर्माण का कार्य कर रहा है। हरखू मिस्त्री ने अपने जीवन में अनेको मकान, दुकान, भवन बनाये थे। मगर जहां और निर्माण कार्य वह जिविका-उपार्जन के लिये करता रहा था, वहीं मंदिर निर्माण कार्य में वह भावनात्मक रूप से जुड गया था। यह कार्य उसने प्रभु की सेवा समझ कर किया था। इस कार्य के लिए मंदिर समिति के कहने पर उसने मजदूरी के 200 रूपये दैनिक में से 50 रूपये प्रभू के नाम के घटा कर मात्र 150 रूपये दैनिक पर कार्य करना मंजूर किया था। तथा करीब-करीब प्रति-दिन ही दिहाडी के आठ घंटो के अलावा एक-डेढ घंटे फालतू भी काम करा था। और उस फालतू काम का कोई ओवर-टाईम भी उसने नही लिया। आज भी मंदिर समिति की ओर हरखू के 1800 रूपये शेष निकलते हैं। आज उसी मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा का समारोह है। इसलिए हरखू का खुश होना स्वभाविक ही है। हरखू ने एक पीतल की थाली खूब रगड-रगड मांज कर चमकायी और उसमे कल शाम दुकान से खरीद कर लाया गया प्रसाद, धूप, नारियल ईत्यादि बडे जतन से सजा, वह तेज-तेज कदमों से मंदिर की ओर चल दिया। मंदिर गांव के दूसरे छोर पर था। वहां तक पहुंचते-पहुंचते हरखू को सात बज गये। मंदिर रंग-बिरंगी कागज की झंडियों व आम के पत्तों की बंदन्वार से सजा अति चित्ताकर्षक लग रहा था। मंदिर में लाउड-स्पीकर से मंत्र पाठ की मधुर ध्वनी गूंज रही थी। मंदिर समिति के लोग भाग-दौड, प्रबंध में लगे थे, मंदिर के प्रांगण में भट्टी पर हलवाई प्रसाद तैयार करने में लगे थे, जिसकी सौंधी-सौंधी गंध मन को हर लेने वाली थी। मंदिर के अंदर पंडित जी तथा गांव के कुछ गण-मान्य लोग मंत्र पाठ कर विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा का कार्य कर रहे थे। मंदिर के बाहर लोग प्रसाद के थाल सजाए प्राण-प्रतिष्ठा का कार्य पूरा होने की प्रतिक्षा कर रहे थे। कुछ बच्चे मंदिर के बाहर धमा-चौकडी मचा रहे थे, तथा कुछ एक-दूसरे के कंधो पर हाथ धरे खडे प्रसाद बनने की कार्यवाही को ध्यान-पूर्वक देख, व प्रसाद की मधुर गंध का रसास्वादन कर रहे थे। हरखू प्रांगण के बाहर गेट पर खडा हो गया। हरखू को पूर्ण उम्मीद थी कि मंदिर समिति के लोग मंदिर निर्माण में उसके योगदान को देखते हुऐ, अवश्य थोडा-बहुत उसका सम्मान करेंगे। वो आते-जाते समिति के हर सदस्य को नमस्कार कर उनका ध्यान आकर्षित करने की नाकाम कोशिश कर रहा था। मगर शायद इस आपा-धापी में किसी का ध्यान हरखू की ओर नही जा रहा था, या फिर वे लोग जान-बूझ कर उसे अन-देखा कर रहे थे। उन लोगों का उपेक्षा पूर्ण व्यवहार हरखू को अच्छा नही लगा। हरखू तो सोच रहा था कि आम-दिनों की भाँति ही मंदिर समिति के लोग उसके कार्य तथा मंदिर निर्माण में उसके योगदान की प्रशंसा करेंगे। खैर फिलहाल उन लोगों की इस अनदेखी का दोष उनकी अति-वयस्तता के सिर मढ हरखू ने संतोष करा और प्राण-प्रतिष्ठा का कार्य समाप्त होने की प्रतिक्षा करने लगा। कुछ समय पश्चात प्राण-प्रतिष्ठा का कार्य समाप्त कर पंडित जी तथा अन्य लोग मंदिर से बाहर आ गये। आम जन जो बाहर प्रसाद लिए खडे थे भगवान की मूर्ती के दर्शन करने तथा प्रसाद चढाने के लिए अंदर की ओर उमड पडे। उन्ही सब के साथ-साथ हरखू भी अपनी प्रसाद की थाली लिए भीतर की ओर बढा। अभी हरखू मंदिर के द्वार के भीतर घुसने ही वाला था, कि जिन मंदिर समिति वालों का ध्यान हरखू की लाख कोशिशों के बाद भी उसकी ओर आकर्षित नही हो रहा था, उन्ही लोगों का ध्यान अनायास ही जाने कैसे हरखू की ओर चला गया। उनमे से चार-पांच लोग तेजी से उसकी ओर लपके तथा उसकी बांहे पकड उसे धकियाते हुऐ मंदिर के प्रांगण से बाहर घसीट लाये। द्वार के बाहर धसीट कर उन लोगों ने उसे धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया। उसका प्रसाद बिखर गया, उसका कुरता फट गया। हरखू हैरान था। वे लोग उसे भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए कहने लगे साला अछूत, मंदिर में घुसा जाता है, पहले दिन ही मंदिर अपवित्र कर डालता। हरखू को गिरने पर ज्यादा चोट तो नही लगी मगर घुटने और कुहनियां छिल गयीं। वह धीरे से उठ कर बैठ गया। उन लोगों का अप्रत्यासित व्यवहार उसकी कुंद बुद्धि की समझ से बाहर था। कल तक वह इसी मंदिर के कंगूरे पर चढा काम करता था। मंदिर के कंगूरे प्रांगण, चबूतरे, गृभ-गृह, कहां-कहां उसके पैर नही पडे? मंदिर के कण-कण में उसका पसीना समाहित था। कल तक वह और मंदिर एकाकर थे, वह मूर्ख खुद को मंदिर से अलग कर नही देख पा रहा था। भला कल तक वह मंदिर में बे-रोक-टोक घूमता काम करता था, तब तो मंदिर अपवित्र नही हुआ। तब तो यह लोग कुछ नही बोले और उल्टा उसकी प्रशंसा करते रहे, तथा उसके त्याग और योगदान की सराहना भी। आज अचानक मंदिर में मूर्ती स्थापित हो जाने पर ये सब उल्टा-पुल्टा क्यों हो रहा है, हरखू सोच रहा था, वह मूर्ख शास्त्रों की बातें भला क्या जाने। क्या भगवान के मन्दिर में स्थापित हो जाने से वह इंसान नही रहा। क्या लंका विजय विजय हेतु सेतु निर्माण कार्य का थोडा भी श्रेय लंका विजित होने पर उसको नही मिलेगा ? हरखू दो घडी धूल में बैठा सिर को हाथों से पकडे सोचता रहा। मंदिर समिति के लोग उसे धकिया कर बुडबुडाते हुऐ मंदिर में लौट गये। हरखू के चारो ओर उसे उसे घेरे खडे बच्चे कौतुक से सारा तमासा देख रहे थे। अचानक हरखू झटके से उठा तथा उसने एक हिकारत भरी नजर उन सभी लोगों तथा मंदिर पर डाली। अपनी थाली उठा उसमें अपना गिर चुका प्रसाद, नारियल आदि चुन कर रखा, तथा रोषपूर्ण मुद्रा में बुडबुडाता हुआ तेज-तेज कदमों से अपने घर की ओर लौट पडा। घर पहुंच कर हरखू ने ओसारे में रखी चक्की को बडे जतन से झाडा-पोंछा तथा श्रर्द्धा पूर्वक दन्डवत प्रणाम कर जोर से जयकारा लगाया “जय चक्की माता की” तथा जयकारे के साथ ही चक्की के पत्थर पर पटक कर नारियल फोड डाला। उसकी आवाज सुन हरखू के दोनो लडके व उनकी बहुऐं तथा उसकी पत्नी भी ओसारे में आ गयीं, तथा सभी आश्चर्य से उसको देखने लगे। हरखू ने बडी श्रद्धा के साथ चक्की पर धूल से सना फूल-प्रसाद चढाया। हरखू एक टांग घुटने से मोड दूसरी टांग पर सीधा खडा हो गया। किसी महान ज्ञानी विद्ध्वान की भांति, कुछ ऐसे भाव चेहरे पर लाकर, मानो उसे आज ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति हुयी हो हरखू जोर से बोला “हे चक्की माता मै मूर्ख क्यूं उस मंदिर की मूर्ती के फेर में पड कर व्यर्थ अपना अपमान करा बैठा, वह मूर्ती भी पत्थर की बनी है और तू भी पत्थर की बनी है, यदि उसमें भगवान का बास हो सकता है तो तुझ में क्यों नही, हे चक्की माता तेरा पिसा अनाज खाकर ही आज मेरे तन में प्राण हैं, आज से तू ही मेरा भगवान है”। हरखू के चेहरे पर इस समय परम संतोष और आनंद के भाव थे। उसने गर्व से अपने पूरे परिवार की ओर मुस्करा कर देखा, तथा एक बार फिर जोर से जयकारा लगाया “बोलो जय चक्की माता की”। हतप्रभ से खडे उसके पूरे परिवार ने भी उसके पीछे-पीछे जयकारा दुहराया “जय चक्की माता की” तथा पूरी दलित बस्ती जयकारे से गूंज उठी।           

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